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Wednesday, February 2, 2011

हुनर

अपने गमो को छुपाना एक हुनर होता है ,
ये बोल कर मेरे अपनों ने गमो का तोफा दिया है ,
फिर छुपाने की गुज़ारिश कर ,
उसे हुनर का नाम दिया है ,
ऐसे अपनों से कितना सिखा हमने ,
दस्ता - ए -जिंदगी में क्या बयां करू ,
भूल गया अब मैं कुछ भी बयान  करना ,
अब बस एक ही हुनर को पाला है ,
जिसे मेरे अपनों ने मुझे सिखाया है ,

Wednesday, January 26, 2011

reenakari: वतन

reenakari: वतन: " वतन ए वतन चले थे ,तेरे लिये की ये रास्ते कही और मुड चले ,कहेते थे जिसे देश प्रेम उससे दूर हो चले , भारत माँ को कराया था ,जंजीरों से ..."

वतन

 वतन

ए वतन चले थे ,तेरे लिये की ये रास्ते कही और मुड चले ,कहेते थे जिसे देश प्रेम उससे दूर हो चले ,
भारत माँ को कराया था ,जंजीरों से मुक्त ,

उन शहीदों की यादो को दफ़न कर चले ,
आखण्ड  अमर ज्योति से कर सलामी ,आखे चुराते हम चले ,दोसी दोसी करते ओरों को हम खुद दोसी बन चले ,
मेरे वतना क्या होगा तेरा ,
हर एक पुत अब कपूत बने ,

Tuesday, January 25, 2011

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Thursday, December 16, 2010

जोकर

जोकर


किसी ने कहा ,
हम जोकर हैं ,
हमने कहा चलो ,

जोकर ही सही ,
जोकर बन किसी को हँसा तो जातें हैं ,
उन का क्या जो आचे बन कर ,
आखो में पानी दे जातें हैं ,
और कुछ कमी रहे जाये ,
तो तनहा छोड़ जातें हैं ,
और तभी खुद को अच्छा बतलातें हैं ,
ऐसी तकदीर पर अफ़सोस होता है  ,
जो अच्छे होकर भी गुन्हा करते हैं ,
इतने गुणकारी होकर भी एक मुस्कान भी नही बाटते,
तो हम जैसे आम लोग जोकर बन जाते हैं ,

मंजिल

मंजिल

नए रस्ते की चाहत में ,
अपनी मंजिल की ओर बड़ते कदम ,
रोज़ एक रस्ते पे चलते हैं ,
जिस से रिश्ता बन चला ,
रोज़ मिलते इस डगर से ,
कुछ हो चला ,
रखते थे कभी चाहत मंजिल की ,
इन् रास्तो पर चलते ,
आज इन् से ही इश्क हो चला ,
क्या देगी अब मंजिल हमे शकु,
अब तो इन् रहो ने राहत देना शुरू कर दिया ,
मंजिल की चाहत से भटका कर ,
इन् रहो ने ठग लिया ,
कहेते थे जिसे इश्क उसने ,हमे भी लुट  लिया ,